Tuesday, 28 June 2016

वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 
आठवाँ नटसम्राट सम्मान 2016

 जीवनपर्यन्त उपलब्धि से सम्मानित
सुपरिचित नाटककार रमाशंकर निशेश 
 के तीन बेहतरीन नाटक 


​​
  आदमखोर 

आदिकाल में मनुष्य जंगलों में रहतापशु-पक्षियों का शिकार करताअपना जीवन-निर्वाह करतायही जानवर प्रायः उस पर भी समय-समय पर हमला कर देते थे। इसलिए अपनी प्राण रक्षा के लिए हमेशा सतर्क रहना होता एवं सदैव ही सुरक्षित स्थानों की खोज में रहता था। सारांश में बिना आत्मबल एवं कठिन परिश्रम के धरती पर जीवन सम्भव नहीं था। इसलिए ये वृद्ध एवं बच्चों को छोड़ सभी सामूहिक रूप से काम करते और अधिक-से-अधिक परिश्रम करतेउसकी इस सामूहिक रूप से कार्य करने की प्रवृत्ति ने कुछ चालाक एवं चतुर लोगों ने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए उसे अपनी दास्ता की बेड़ियों में जकड़ स्वयं को उस पर हावी होकर उसे इस्तेमाल करने लगा। इस तरह मनुष्य दो भागों में बँट गया-
शोषक एवं शोषित।


 चील घर 

चीलघर’ नाटक आज के युग के कड़वे सत्य को उजागर एवं जीवित करता है। ये एक ऐसा सत्य जो इतना क्रूरजिसे कहीं से भी उठाया जा सकता है। कुछ समझ में नहीं आतासमस्त सामाजिक ढाँचा अस्त-व्यस्त सा लगता है जो अववाहन करता दिखाई देता है। इसका हल सिर्फ मेरेआपकेहमारे हाथ में है एवं केवल हमसे सम्बन्धित हैअन्य कोई कुछ नहीं कर सकता। इस जिम्मेदारी को केवल हमें ही उठाना होगा।

कभी बचपन में सुनते थे दादी माँ की कहानीया नानी माँ की कहानीजो वास्तविक रूप में हमारे मस्तिष्क में इस तरह से बैठ जाती थी जिसे हम सारा जीवन कभी भुला नहीं पाते थे। हमने सुना है माँ बच्चे को जन्म देने से पहले उसे इतना योग्य बना देती थी कि आगे आने वाली परिस्थितियों से जूझने की शक्ति उसमें पहले से ही मौजूद रहती थी। अभिमन्यु का चक्रव्यूह में घुस जानागर्भ में ही प्रवेश करने का ज्ञानएकलव्य को देखकर ही निशाना बाँधने का ज्ञान उन सबको केवल अपनी माता द्वारा ही प्राप्त हो सका था। हमारे ग्रन्थों में ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं।


 कुक्कू डार्लिंग 

नाटक का नायक अविनाश रूढ़िवादी समाज के खोखले नियमों से विद्रोह कर घर त्याग देता है। जिससे पिता को काफी आघात पहुँचता है। एक ही पुत्र होने के कारण उनके बाद परिवार की डोर को आगे कौन सँभालेगा। परन्तु वह इन तमाम बातों की चिन्ता किये बिना घर छोड़ देता है। बाहर निकल उसे समस्त समाज का ढाँचा ही पूरी तरह से अस्त-व्यस्त दिखाई पड़ता है।

वह देखता है छुआछूत से ग्रस्त लोगव्यक्तिगत लाभ के लिए अपने सारे सिद्धान्तों को ताक पर रख देने वाले लोगक्या गाँवक्या शहर सभी पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं। इन तमाम दोषों की चिन्ता किये बिना आगे बढ़ता जाता है एवं जितना आगे जाता है उतना ही इस वातावरण को और भी अधिक खोखला पाता है।



रमाशंकर निशेश
सन् 1931 में जन्मे रमाशंकर निशेश रंगमंच के एक सुपरिचित नाटककार हैं। कुछ समय स्नातक के रूप में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में रहे। इलाहाबाद नाट्य संघ द्वारा इनके कई नाटकों को पुरस्कृत किया गया। साहित्य कला परिषद् दिल्ली द्वारा नाटक आदमखोर’ सर्वोत्तम नाट्य-लेखन के लिए प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत तथा दिल्ली नाट्य संघ द्वारा 1983 में रंगमंच में उनकी विशेष सेवाओं के लिए सम्मानित होने के साथ ही उन्हें वर्तमान में आठवाँ नटसम्राट सम्मान 2016 से भी सम्मानित किया गया। रंगमंच से पूर्णतया जुड़े रहने के कारण उनके सभी नाटक मंचनीय हैं 

रचनाएँ:आदमखोरकुक्कू डार्लिंगकोठाअमीबाअपभ्रंशप्यार कैसे होता हैमहासम्मेलनसीपियाँमेमो;अपनी डफलीअपना रागकुत्ता किसका हैडूबा वंश कबीर का। 




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